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नाना पाटेकर

आ गए सब मेरी मौत का देखने तमाशा खत्म हुआ सांसों का खेल,खत्म हुई आशा.  जिंदगी थी तो एक उसूल था  पहले लात, फिर बात और फिर मुलाकात का रूल था  पर मौत से जब हुई अपनी बात  बदल गए सारे हालात.  चीख चीख कर दुनिया को ये बात बतायी थी  ये हिन्दू मुसलमान का खून सब एक है मिला कर ये बात बतायी थी कहा था इंसान बन कर जीओगे तो जी जाओगे वर्ना धर्म के चक्कर में मारे जाओगे वक़्त जब हमारा था तो गोली भी हमारी थी  ज़ालिमों के आगे न झुकने वाली जुबान हमारी थी  आवाज कड़क थी मगर दिल का फकीर था  जानता सिस्टम का सच था जानता हर तस्वीर था  वह जानता था हर सच जानता था  सिस्टम के सामने मरेगा आदमी ही हर दर्द पहचानता था  जो कहता था भगवान का दिया सब कुछ है उसके पास मगर जाते ज़ाते कह गया अंतिम समय की लकड़ी है उसके लिए खास  पर्दा गिर चुका है रंगमंच का सन्नाटा अब छाने दो  फकीर अपने लिए लकड़ी तक जमा कर गया चैन से उसे जाने दो

almost प्यार

इंसान दो चीजों से बना है, एक दुःख और दूसरा सुख का इंतजार. प्यार सुख की उम्मीद और दुख के खतम होने के इंतजार के बीच एक पुल की तरह है.  

माँ! के नाम पत्र

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माँ!        डेढ़ दशक हो गये,जब आपने हम सबसे विदा लिया. राम जी के वनवास से भी ज्यादा.  ये कैलेंडर कहता है मगर दिल कहता है डेढ़ लम्हा भी नहीं हुआ,जैसे आज और अभी की ही बात हो.आज की यह तारीख़ मेरी ज़िंदगी के कैलेंडर से कोई डिलीट कर दे और बस यहीं पर सब कुछ रोक दे,दुर्गा पूजा का वो समय था जंहा सब लोगों अपने यहां भगवती को बुला रहे थे उस समय आप हमे छोड़ कर चले गए,दुर्गा पूजा मे सबके यहां माता आती है और मेरे पास से माँ ............... वो समय आज भी सिहरन देता है उस समय मैं इतना तो नहीं समझ पाया था की आपका न रहना मुझे कितना प्रभावित करेगा उस समय तो लोगों ने समझाया ऐसा होता है,तुम अकेले थोड़ी हो! वगैरह वैगरह. मेरे साथ भी हुआ लेकिन आज केवल इतना नहीं है.आपका जाना संसार के सारे जीव का मुख मोड़ लेना था,मुझे emotion के स्तर पर इतना कमजोर कर गया आपका जाना की आज तक किसी का बेटा मात्र बोल जाना मुझे उसके माया जाल मे डाल कर अपने आप को भुला देता है.कोई थोड़ा सा प्यार दिखा देता है तो मैं अपना सब कुछ भूल सा जाता हूँ लोग मुझे अपनी सहूलियत के हिसाब से गले लगाते है फिर उनका गला भारी हो जात...

हिन्दी दिवस

उसके माथे पर बिंदी और मेरी जुबान पर हिन्दी  आहा आहा........ 

8 अगस्त 2026

दुनिया में जितने भी लोग एक दूसरे को गले लगाते है तो उनके गले लगे रहने का औसत समय केवल 3 सेकंड होता है, जब हम किसी को 20 सेकंड से ज्यादा देर के लिए गले लगाते है तब हम पिघलना शुरू होते है.  गले लगने से दुख खतम नहीं होता पिघलने लगता है 

07 अगस्त 2026

कभी कभी हमे सांत्वना केवल दूसरों के दुख से मिलती है. हम सभी कुछ न कुछ झेल रहे हैं और यही इस दुनिया को रहने लायक बनाता है, इस दुनिया को दुःख ने ही जोड़ रखा है वर्ना उम्मीद पर दुनिया इतना लम्बा नहीं टिकती. 🖊️✒️ किताब 

कैसे भूल जाऊँ

पास किसी के जाता हू तो डरता हू कंही ज्यादा पास न चल जाऊँ, गले लगा कर गला काट लिया है किसी ने मेरा,कैसे तुम्हें गले लगाऊँ  मेरा फोन बंद रहने से अटक जाती थी सांसे उसकी भी,  और वो मरते हुए मुझे छोड़ गयी बताओ उसको मैं कैसे भूल जाऊँ     ✒️ नीलेश सिंह 

दर्द

जब ज़रूरत थी तब तक... अपनी ज़रूरत थी तब तक बात की दिल खोलकर, रात-रात भर, लगातार मेसेजों की बारिश,अच्छी अच्छी बातें, तारीफ़ें, वादे और हसीं मज़ाक़ ,फिर धीरे से प्यार की बातें शुरू हुईं।लफ़्ज़ों में शहद घुल गया, रातों को नाम मिल गया और सुबहों को इंतज़ार।लगा जैसे कोई अपना मिल गया, जो सुनता है, समझता है, थामता है।  और फिर... अचानक सब बंद…. मेसेज बंद, बातें बंद, रिप्लाई बंद और एक दिन वो इंसान जो मेरे हर नोटिफिकेशन पर आ जाता था, वो अब मेसेज देख के भी ख़ामोश हो गया,पूछो तो बिजी हूँ,दोबारा पूछो तो बाद में बात करते हैं,तीसरी बार पूछने की हिम्मत ही नहीं बचती, क्योंकि सामने से जो दीवार खड़ी हो गई है, उस पर सिर मारना सिर्फ़ अपना ही नुक़सान है। सबसे ज़्यादा तकलीफ़ “ना” सुनना नहीं लगता, सबसे ज़्यादा तकलीफ़ वो ख़ामोशी देती है जो बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाती है।वो ख़ामोशी जो बताती है कि तुम बस एक वक़्ती ज़रूरत थे।जब उसे तन्हाई काट रही थी, जब उसे कोई चाहिए था सुनने वाला, तब तुमसे बातें की और तुम याद आए।तुम्हारी बातों ने मरहम का काम किया, तुम्हारे वक़्त ने उसका अकेलापन भरा और जैसे ही उनकी दुनिया फि...

छठ एक एहसास

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छठ त्यौहार नहीं एक एहसास दशहरा,दिवाली तो है त्यौहार  छठ पूजा है हर बिहारी का प्यार,  सारे त्योहार शहर मे भी मना सकते है,  दिल नहीं लगेगा अगर छठ मे नहीं पहुँचोगे घर,द्वार          यह पर्व केवल पर्व नहीं एक एहसास है,छठ आस्था का ऐसा संगम है जंहा प्रकृति का हर रूप एक जगह जमा हो जाता है और जिसमें हम डुबकी लगाते है. छठ पूजा का पौराणिक कथाओं में अलग ही महत्व है                              सूर्य उपासना के महत्व की चर्चा  महाभारत,रामायण,ब्रह्वर्तपुराण सभी में है.यह अकेली ऐसी पूजा है जहां डूबते सूरज को प्रणाम किया जाता है यह अपने आप में अनोखा है.    छठ पूजा का प्रथम दिन नहाए खाए के साथ शुरू होता है और चौथे दिन उषा अर्ध्य के साथ यह पावन पर्व समाप्त होता है पुरानी मान्यताओं के अनुसार भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री और सूर्य देव की बहन है षष्ठी छठी मां,इस व्रत में इन्हीं दोनों का पूजन किया जाता है.छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की भी आराधना होती है. प्रातः काल में स...

मैं और उसका कंधा

एक ख्वाहिश है की..................   उसके कंधे पर सिर रख कर जी भरकर रो लू, और मेरे आंसू खतम हो जाए,  जैसे पहाड़ों से टकराकर बादल बरस ज़ाते है मैं उसके गले लग कर आँखों के आंसू को रोक न पाऊँ मैं रोते रोते चुप हो जाऊँ इतना रो लू की मुझे फिर रोना न पड़े.  जीवन में कोई भी परिस्थिति मुझे रुला न पाए                             और फिर  मैं दूर बहुत दूर चला जाऊँ............     

इतवार

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कुछ ऐसा था मेरा इतवार  उगते सूरज ने दिया खुशियो का उपहार  मंदिर की घंटियों ने बताया संग बैठने का व्यवहार  घंटे, मिनट, सेकंड घड़ियां सब साथ थे बातें इतनी की मोबाइल भी हो गया आज बेरोजगार। साथ थे उनके तो सुकून था दिल में भरा अनुभव हुआ जैसे छेड़ रहा कोई वीणा के तार.  मिला प्यार, मिला अपनापन थी जिसकी भूख हमे  संग मिल खाया चावल, छोला और आचार  उनका होना कोने कोने का महसूस हो रहा था  साथ थे तो लगा जैसे उतर आया खुशियों का संसार। चाह ऐसी की घड़ी की टिक-टिक रुक जाए  साथ रहे वो आए न अब सोमवार। खुशियों से मन मचल रहा था जब वो साथ थे दूर हुए तो लगा जैसे लिया कलेजा निकाल। कुछ ऐसा था मेरा इतवार………. ✍️ नीलश सिंह पटना विश्वविद्यालय

खुद को गलत मान,

कितना बुरा हो गया हूं मैं दिलों से सबके उतर गया हू मैं लोगों से माफी मांग कर थक गया  मैं गलत हूं ये मान गया हू मैं  सच बोल कर ग्लानि मे जी रहा हूँ  झूठ उतना भी गलत नहीं होता ये मान गया हूं मैं  संबंधो के नफा-नुकसान का हिसाब न लगा पाया मैं  मेरी औकात क्या है ये जान गया हू मैं  ✒️नीलेश सिंह 

शारदा सिन्हा

यादो का लेकर साया,  कर गयी हमको पराया  हमारी लाडली......  तुमने जब जब गुनगुनाया  हमने दउरा ( छठ का ड़ाला) उठाया  कदम और तेज हुए,कदम और तेज हुए  हमको वजन न बुझाया,जल्दी से छठ घाट पहुंचाया  तू सब की लाडली..............  कैसे अनसुना कर पाएंगे जो बोल! तूने सुनाया  छोड़ गयी सबको क्या गलती हुई! नहीं बताया  नए घर क्यों गयी,नए घर क्यों गयी  क्यों नहीं तूने बताया, सबको रुलाया तू सब की लाडली.................  🙏🙏🙏

बारिश के रंग, खुद ही खुद के संग ♥️♥️

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          पटना की शाम और शाम की ये बारिश, कल तक जिस गर्मी से परेशान थे आज उसकी गर्मी शांत करने के बाद सुहाने मौसम से परेशान हो रहे थे.बारिश के इस मौसम में हाथों में कुछ किताबें लिए जीवन की तमाम फालतू बातों को मन में जमा कर सोच रहा था! जीवन का उद्देश्य क्या है,मैं क्या कर रहा हूं, मैं अपने आपको कोसते हुए आगे बढ़ रहा था,तभी नेपथ्य से भीगते हुए सामने आ कर खड़ी हो गयी एक संस्कारी कन्या को इस संसार मे देख कर मेरी निराशा की गहन कोठरी में उत्साह के नव नूपुर बज उठते हैं। निराशावादी चिंतन आशावादी चिंतन में तब्दील हो जाता है। बादल घुमड़ते है इधर मेरा मन भी. मन के आकाश में सौंदर्य के बादल घेरने लगते है। रुप लावण्य देखकर मन में भरतनाट्यम हो ही रहा होता है,तब तक कन्या पूछ बैठी आज ही बारिश हुई न हमारे यहां तो दो दिन से ही रही थी,ये सुन कर समझ गया की ये कन्या पटना की नहीं है,शक्ल से काफी तैयार हो कर निकली हुई प्रतीत हो रहीं थीं,बारिश में भीगने के बाद भी मेकअप नहीं उतरा या मेकअप इतना ज़्यादा है कि बारिश भी उसका बाल बांका नहीं कर पायी शायद!  बालों को बड़े ही बाँ...

अपने अपने इरादे

धोखा दोनों को मिला  मैने तुम्हे औरों से अलग समझा, और तुमने मुझे औरों जैसा समझा..

#stop_rape

आज सुबह हमने जब अखबार उठाया पहले पन्ना देख कर मन घबराया  देखा आँखों ने मगर मन चिड़चिड़ाया  सुन कर कान को हमने अधीर पाया हुआ क्षण गंभीर और मन घबराया आज फिर नारी को हमने अबला बनाया हटा ना तिमिर ना बदली काया  उजाला देने वाले को भी आज हमने अंधकार में पाया  शक्ति कह कर जिसे पूजते हम उसे निःशक्त का आज फिर शिकार पाया  माँ से जीवन,बहन की रक्षा का था प्रण खाया पुत्र की जननी को भी अपने दूध पर लज्जित पाया जो रखती बेटों, पतियों के लिए निर्जला व्रत आज उसी की जिंदगी को तार-तार पाया I बोल रहे थे मर्द जिसे,उसने जानवरों सा नोच खाया  इज़्ज़त कहते है जिसे आज हमने उसे सरे आम बनाया  जिसे कहते दुर्गा काली,रक्षा करती खप्पर वाली  आज उसे ही हमने अपना हथियार बनाया I कैसा हो गया खून हमारा, कैसा हमने संस्कार पाया  पत्थरों में दर्द आया झंझा मे आज झंकार पाया  देख रहा था चक्र वाला भी आज त्रिलोक से,  नीचे वाले भगवान को न वो बचा पाया  इंसान की खाल में हमने भेड़िया पाया रक्षक को ही भक्षक बनाया  बेटी को क्या बचाया और क्यों उसे पढ़ाया  तलवारों की जगह रण...

T20

हरेक के जीवन में कोई न कोई कसक तो रह ही जाती है,इंसान अपने सबसे बुरे और सबसे अच्छे दिनों में अपने सबसे करीबी व्यक्ति को याद करता है। मगर  हार्दिक पांड्या जो अपने बुरे दौर से बाहर आ रहा था,तो इसके बुरे दिनों न में कोई था जो उसे सांत्वना देता और न ही कल उसके पास कोई था जिसके गले लगकर वो खुशी में ज़ोर जोर से रोता. मर्द धरती का सबसे कमजोर इंसान होता है जब उसे मर्द बोल कर रोने से रोका जाता है. 

सुख

सुख क्या है ? हर वो भावना जिसमें डर निहित हो।

emotion

भावनात्मक लगाव स्त्रियों को होता है वैश्याओ को नहीं. 

पुरुष

संसार की सारी पौराणिक आधुनिक महान कृतियों की केंद्र स्त्रियां रही है सदैव। स्त्रियों को देवी, माता का दर्जा मिला लेकिन पुरुष योद्धा बन कर रह गया, पुरुष के प्रेम को कायर बताया गया इतिहास मे. उसे हमेशा स्त्री के लिए लड़ना पड़ा. उसे ही धनुष तोड़ना पड़ा, उसे ही मछली की आंख पर निशाना लगाना पड़ा. उसे अपना प्रेम सिद्ध करना पड़ा, वो हमेशा विवश रहा स्त्रियों के आंसुओ के सामने.      रामायण की सीता का त्याग हम जान गए, लेकिन उस राम का त्याग न देख पाए जो एक स्त्री की बातों में आकर पुत्र को बनवास दिया तो पुत्र, पिता के वचन के लिए अपने सुख को छोड़ जंगल निकल गया. पुरुष के मना करने पर भी जब महिला बाहर निकली तो पुरुष ने उसको छोड़ा नहीं उसके लिए लड़ा और लंका पर विजय प्राप्त करके उसे लाया. उसने पुत्र धर्म, पति धर्म, राज्य धर्म सबका पालन किया. उसने अगर नहीं किया कुछ तो स्वधर्म का पालन. पुरुष सबके लिए लड़ा,सिवाय खुद को छोड़ कर  द्रौपदी को सबने सराहा उसके क्रोध को, प्रतीक्षा को, उसके प्रतिशोध को। किंतु वंचित रह गया कर्ण, भीष्म और अर्जुन जैसे नायकों के वास्तविक युद्ध से, जिसे उन्होंने रणभूम...