दर्द
जब ज़रूरत थी तब तक...
अपनी ज़रूरत थी तब तक बात की दिल खोलकर, रात-रात भर, लगातार मेसेजों की बारिश,अच्छी अच्छी बातें, तारीफ़ें, वादे और हसीं मज़ाक़ ,फिर धीरे से प्यार की बातें शुरू हुईं।लफ़्ज़ों में शहद घुल गया, रातों को नाम मिल गया और सुबहों को इंतज़ार।लगा जैसे कोई अपना मिल गया, जो सुनता है, समझता है, थामता है।
और फिर... अचानक सब बंद….
मेसेज बंद, बातें बंद, रिप्लाई बंद और एक दिन वो इंसान जो मेरे हर नोटिफिकेशन पर आ जाता था, वो अब मेसेज देख के भी ख़ामोश हो गया,पूछो तो बिजी हूँ,दोबारा पूछो तो बाद में बात करते हैं,तीसरी बार पूछने की हिम्मत ही नहीं बचती, क्योंकि सामने से जो दीवार खड़ी हो गई है, उस पर सिर मारना सिर्फ़ अपना ही नुक़सान है।
सबसे ज़्यादा तकलीफ़ “ना” सुनना नहीं लगता, सबसे ज़्यादा तकलीफ़ वो ख़ामोशी देती है जो बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाती है।वो ख़ामोशी जो बताती है कि तुम बस एक वक़्ती ज़रूरत थे।जब उसे तन्हाई काट रही थी, जब उसे कोई चाहिए था सुनने वाला, तब तुमसे बातें की और तुम याद आए।तुम्हारी बातों ने मरहम का काम किया, तुम्हारे वक़्त ने उसका अकेलापन भरा और जैसे ही उनकी दुनिया फिर से आबाद हुई, तुम्हारी अहमियत ख़तम ,तुम फ़ालतू हो गए, क्योंकि तुम सिर्फ़ उनके लिए मन और दिल बहलाने की चीज़ थे।
दर्द इस बात का नहीं कि वो चले गए,दर्द इस बात का है कि वो ऐसे गए जैसे हम थे ही नहीं।न कोई वजह, न कोई लड़ाई,न कोई अलविदा,बस इंसान तो वही,पर रवैया बदल गया।जो कल तक ख़ास थे, आज कोई भी नहीं रहे।
ये बिना किसी पूर्व चेतावनी, कारण या स्पष्टीकरण कर सिर्फ़ बात बंद करना नहीं है, ये किसी के जज़्बात का जनाज़ा निकालकर चुपचाप कंधा झाड़कर चल देना है। ये उस इंसान को अधर में लटका देना है जो आपके एक Hello पर भी अपनी पूरा दिन कुर्बान कर देता था अब वो हर मिनट फ़ोन चेक करता है, उम्मीद और बेइज़्ज़ती के बीच झूलता है,सोचता है या ग़लती हो गई मुझसे?, क्या मैंने ज़्यादा प्यार कर लिया? क्या मैं इतना सस्ता था?
असल में कुछ लोग मोहब्बत नहीं करते, वो सहारा ढूँढ़ते हैं और सहारा मिल जाए तो मुसाफ़िर को सराय याद नहीं रहती। तुम उनके लिए इंसान नहीं थे, तुम वक़्त थे और वक़्त गुज़र गया तो तुम भी गुज़र गए।
पर सुनो, उनका बिजी हो जाना तुम्हारी क़ीमत कम नहीं करता। जो बिना वजह आए थे, वो बिना वजह ही जाएँगे। जो ठहरने के लिए नहीं बने, उन्हें रोककर भी क्या करोगे? तकलीफ़ होगी, रातें लंबी होंगी, मेसेज बॉक्स बार-बार खोलोगे…. पर एक दिन ये आपकी ख़ामोशी भी बोल पड़ेगी, वो दिन तुम्हें लगेगा कि अच्छा हुआ जो चले गए,क्योंकि जो ज़रूरत पड़ने पर याद करे और ज़रूरत पूरी होने पर भूल जाए, वो मोहब्बत के क़ाबिल ही नहीं था।
तुम उनके लिए ऑप्शन थे,वो तुम्हारे लिए चुनौती… फ़र्क़ बस इतना है।
तो अब क्या करना है? कुछ नहीं, ब्लॉक मत करो, मेसेज मत डिलीट करो, बस ख़ुद को इतना कीमती बना लो कि अगली बार कोई “ज़रूरत” के लिए नहीं, “ज़रूरी” समझकर आए और जब तक वो न आए, अपनी इज़्ज़त से समझौता मत करना,क्योंकि जो चला गया, वो तुम्हारा था ही नहीं और जो तुम्हारा है, वो ख़ामोशी से नहीं, शोर से आएगा ,तुम्हें अपनाने के शोर से।
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