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किताब मेरी कहानी सबकी

अध्याय 1: साद्पुर की माटी, मंदार की छाँव और माँ का आँचल ​बांका जिले का साद्पुर गाँव—जहाँ सुबह की शुरुआत मंदार पर्वत की धुंधली पहाड़ियों और झारखंड की तरफ से आने वाली मलय हवाओं से होती है। इस गाँव से पटना जाने का मतलब सिर्फ एक शहर बदलना नहीं था, बल्कि बांका इंटरसिटी ट्रेन के डिब्बे में अपनी अनगिनत उम्मीदों को ठूंसकर शहर की अंधी दौड़ में शामिल होना था। ​राहुल के व्यक्तित्व की नींव उसका ननिहाल और हरियाणा का वह दौर था जहाँ उसने प्राथमिक शिक्षा पाई। हरियाणा के उस शहर में बिताए दिनों की छांव आज भी उसके भीतर जीवित है। वहाँ के वे अंकल-आंटी, जिनके आँगन में राहुल का बचपन पला-बढ़ा, आज भी उसके जीवन के सुंदरतम अध्यायों में दर्ज हैं। भले ही मीलों की दूरियाँ आ गईं हों, पर उस घर की बेटी ईशा आज भी हर साल भाई-दूज या रक्षाबंधन पर डाक के जरिए राखी भेजना नहीं भूलती। ​राहुल के भीतर की शालीनता का एक बड़ा स्रोत उसका ननिहाल था। उसके नाना गणित के ऐसे अनुशासित शिक्षक थे, जिनका जीवन किसी परिकलित प्रमेय (Theorem) की तरह स्पष्ट और सटीक था। उस अनुशासन की महक राहुल की माँ में रची-बसी थी। माँ कोई साधारण स्त्री नहीं...

शरद पूर्णिमा

​चाँद की चमक तीखी और खीर थोड़ी फीकी है, तबीयत भले चंगी हो मगर चीनी थोड़ी महँगी है। छत पर बैठ कर खाली चांद निहार रहे हो  जेब है खाली तो ख्यालों की ही खीर उतार रहे हो  महंगा नहीं कुछ भी गरीब हो तुम  क्या उनकी तरह फकीर हो तुम  झोला उठा कर तुम चांद पर चले जाना  उससे एक बात पूछ कर तुम आना   दाग भी है तुझमे और तेरी खूबसूरती के चर्चे तमाम है  अपनी वाली को खूबसूरत बताने की उपमा तू आम है  हँसकर बोला जैसे तूने सबको एक चूर्ण बांट रखा है  इसलिए तो कटे चांद ने तेरे से पहले भी कईयों का काट रखा है  ✒️ नीलेश सिंह 

फिक्र

अगर आपको कोई चीज़ पसंद है तो  ये फिक्र मत करो की आप उसके लायक है की नहीं. 

उसकी यादों मे

पुराना कोई हिसाब बाकी है हाथ में देना गुलाब बाकी है  पसंद थी उसको चाय बहुत संग मैं भी पीता था उसके साथ मे बैठ कर पीना शराब बाकी है 

खाली पीली

लोगों को कठोर दिख रहा हू मैं आज कल मैंने नरम होने की कीमत चुकाई है आज मैं उदास हूं खुश रहने के लिए  कल मुझे सूखे पत्तों सा समेट कर किसी ने आग लगायी है कल तक मेरी खूबियाँ बताते नहीं थकते थे जो  उसी ने आज मुझमे बहुत सी कमियां बतायी है.       ✒️ नीलेश सिंह 

खाली पीली

आए है और बड़ी शान से आए हैं हम जमीन पर आसमान से आए हैं हम  महक रहा है आपका आँगन हमारे आने से हैरत क्यू फ़ूलों के खानदान से आए हैं हम.  खाली पीली 

खाली पीली

दर्द देंगे वो सिसकियाँ देंगे हम है काग़ज़ वो सिसकियाँ देंगे  जुगनुओं ने शराब पी ली है  अब वो सूरज को गालियां देंगे  आ गयी इश्क में अब वो नौबत  डाकिये घर आ कर चिट्ठियां देंगे  मेरे बीमार पड़े चेहरे को  अब अपने होंठो की सुर्खियां देंगे  हाँ सुना है वो फूल जैसी है - 2 तोहफे मे उसको तितलियां देंगे आप जो बैठने नहीं देते संग अपने अब खुद उठ कर हमे कुर्सियाँ देंगे  विष्णु विराट