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दर्द

जब ज़रूरत थी तब तक... अपनी ज़रूरत थी तब तक बात की दिल खोलकर, रात-रात भर, लगातार मेसेजों की बारिश,अच्छी अच्छी बातें, तारीफ़ें, वादे और हसीं मज़ाक़ ,फिर धीरे से प्यार की बातें शुरू हुईं।लफ़्ज़ों में शहद घुल गया, रातों को नाम मिल गया और सुबहों को इंतज़ार।लगा जैसे कोई अपना मिल गया, जो सुनता है, समझता है, थामता है।  और फिर... अचानक सब बंद…. मेसेज बंद, बातें बंद, रिप्लाई बंद और एक दिन वो इंसान जो मेरे हर नोटिफिकेशन पर आ जाता था, वो अब मेसेज देख के भी ख़ामोश हो गया,पूछो तो बिजी हूँ,दोबारा पूछो तो बाद में बात करते हैं,तीसरी बार पूछने की हिम्मत ही नहीं बचती, क्योंकि सामने से जो दीवार खड़ी हो गई है, उस पर सिर मारना सिर्फ़ अपना ही नुक़सान है। सबसे ज़्यादा तकलीफ़ “ना” सुनना नहीं लगता, सबसे ज़्यादा तकलीफ़ वो ख़ामोशी देती है जो बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाती है।वो ख़ामोशी जो बताती है कि तुम बस एक वक़्ती ज़रूरत थे।जब उसे तन्हाई काट रही थी, जब उसे कोई चाहिए था सुनने वाला, तब तुमसे बातें की और तुम याद आए।तुम्हारी बातों ने मरहम का काम किया, तुम्हारे वक़्त ने उसका अकेलापन भरा और जैसे ही उनकी दुनिया फि...

छठ एक एहसास

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छठ त्यौहार नहीं एक एहसास दशहरा,दिवाली तो है त्यौहार  छठ पूजा है हर बिहारी का प्यार,  सारे त्योहार शहर मे भी मना सकते है,  दिल नहीं लगेगा अगर छठ मे नहीं पहुँचोगे घर,द्वार          यह पर्व केवल पर्व नहीं एक एहसास है,छठ आस्था का ऐसा संगम है जंहा प्रकृति का हर रूप एक जगह जमा हो जाता है और जिसमें हम डुबकी लगाते है. छठ पूजा का पौराणिक कथाओं में अलग ही महत्व है                              सूर्य उपासना के महत्व की चर्चा  महाभारत,रामायण,ब्रह्वर्तपुराण सभी में है.यह अकेली ऐसी पूजा है जहां डूबते सूरज को प्रणाम किया जाता है यह अपने आप में अनोखा है.    छठ पूजा का प्रथम दिन नहाए खाए के साथ शुरू होता है और चौथे दिन उषा अर्ध्य के साथ यह पावन पर्व समाप्त होता है पुरानी मान्यताओं के अनुसार भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री और सूर्य देव की बहन है षष्ठी छठी मां,इस व्रत में इन्हीं दोनों का पूजन किया जाता है.छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की भी आराधना होती है. प्रातः काल में स...

माँ! के नाम पत्र

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माँ!        डेढ़ दशक हो गये,जब आपने हम सबसे विदा लिया. राम जी के वनवास से भी ज्यादा.  ये कैलेंडर कहता है मगर दिल कहता है डेढ़ लम्हा भी नहीं हुआ,जैसे आज और अभी की ही बात हो.आज की यह तारीख़ मेरी ज़िंदगी के कैलेंडर से कोई डिलीट कर दे और बस यहीं पर सब कुछ रोक दे,दुर्गा पूजा का वो समय था जंहा सब लोगों अपने यहां भगवती को बुला रहे थे उस समय आप हमे छोड़ कर चले गए,दुर्गा पूजा मे सबके यहां माता आती है और मेरे पास से माँ ............... वो समय आज भी सिहरन देता है उस समय मैं इतना तो नहीं समझ पाया था की आपका न रहना मुझे कितना प्रभावित करेगा उस समय तो लोगों ने समझाया ऐसा होता है,तुम अकेले थोड़ी हो! वगैरह वैगरह. मेरे साथ भी हुआ लेकिन आज केवल इतना नहीं है.आपका जाना संसार के सारे जीव का मुख मोड़ लेना था,मुझे emotion के स्तर पर इतना कमजोर कर गया आपका जाना की आज तक किसी का बेटा मात्र बोल जाना मुझे उसके माया जाल मे डाल कर अपने आप को भुला देता है.कोई थोड़ा सा प्यार दिखा देता है तो मैं अपना सब कुछ भूल सा जाता हूँ लोग मुझे अपनी सहूलियत के हिसाब से गले लगाते है फिर उनका गला भारी हो जात...

मैं और उसका कंधा

एक ख्वाहिश है की..................   उसके कंधे पर सिर रख कर जी भरकर रो लू, और मेरे आंसू खतम हो जाए,  जैसे पहाड़ों से टकराकर बादल बरस ज़ाते है मैं उसके गले लग कर आँखों के आंसू को रोक न पाऊँ मैं रोते रोते चुप हो जाऊँ इतना रो लू की मुझे फिर रोना न पड़े.  जीवन में कोई भी परिस्थिति मुझे रुला न पाए                             और फिर  मैं दूर बहुत दूर चला जाऊँ............     

इतवार

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कुछ ऐसा था मेरा इतवार  उगते सूरज ने दिया खुशियो का उपहार  मंदिर की घंटियों ने बताया संग बैठने का व्यवहार  घंटे, मिनट, सेकंड घड़ियां सब साथ थे बातें इतनी की मोबाइल भी हो गया आज बेरोजगार। साथ थे उनके तो सुकून था दिल में भरा अनुभव हुआ जैसे छेड़ रहा कोई वीणा के तार.  मिला प्यार, मिला अपनापन थी जिसकी भूख हमे  संग मिल खाया चावल, छोला और आचार  उनका होना कोने कोने का महसूस हो रहा था  साथ थे तो लगा जैसे उतर आया खुशियों का संसार। चाह ऐसी की घड़ी की टिक-टिक रुक जाए  साथ रहे वो आए न अब सोमवार। खुशियों से मन मचल रहा था जब वो साथ थे दूर हुए तो लगा जैसे लिया कलेजा निकाल। कुछ ऐसा था मेरा इतवार………. ✍️ नीलश सिंह पटना विश्वविद्यालय

खुद को गलत मान,

कितना बुरा हो गया हूं मैं दिलों से सबके उतर गया हू मैं लोगों से माफी मांग कर थक गया  मैं गलत हूं ये मान गया हू मैं  सच बोल कर ग्लानि मे जी रहा हूँ  झूठ उतना भी गलत नहीं होता ये मान गया हूं मैं  संबंधो के नफा-नुकसान का हिसाब न लगा पाया मैं  मेरी औकात क्या है ये जान गया हू मैं  ✒️नीलेश सिंह 

शारदा सिन्हा

यादो का लेकर साया,  कर गयी हमको पराया  हमारी लाडली......  तुमने जब जब गुनगुनाया  हमने दउरा ( छठ का ड़ाला) उठाया  कदम और तेज हुए,कदम और तेज हुए  हमको वजन न बुझाया,जल्दी से छठ घाट पहुंचाया  तू सब की लाडली..............  कैसे अनसुना कर पाएंगे जो बोल! तूने सुनाया  छोड़ गयी सबको क्या गलती हुई! नहीं बताया  नए घर क्यों गयी,नए घर क्यों गयी  क्यों नहीं तूने बताया, सबको रुलाया तू सब की लाडली.................  🙏🙏🙏