माँ! डेढ़ दशक हो गये,जब आपने हम सबसे विदा लिया. राम जी के वनवास से भी ज्यादा. ये कैलेंडर कहता है मगर दिल कहता है डेढ़ लम्हा भी नहीं हुआ,जैसे आज और अभी की ही बात हो.आज की यह तारीख़ मेरी ज़िंदगी के कैलेंडर से कोई डिलीट कर दे और बस यहीं पर सब कुछ रोक दे,दुर्गा पूजा का वो समय था जंहा सब लोगों अपने यहां भगवती को बुला रहे थे उस समय आप हमे छोड़ कर चले गए,दुर्गा पूजा मे सबके यहां माता आती है और मेरे पास से माँ ............... वो समय आज भी सिहरन देता है उस समय मैं इतना तो नहीं समझ पाया था की आपका न रहना मुझे कितना प्रभावित करेगा उस समय तो लोगों ने समझाया ऐसा होता है,तुम अकेले थोड़ी हो! वगैरह वैगरह. मेरे साथ भी हुआ लेकिन आज केवल इतना नहीं है.आपका जाना संसार के सारे जीव का मुख मोड़ लेना था,मुझे emotion के स्तर पर इतना कमजोर कर गया आपका जाना की आज तक किसी का बेटा मात्र बोल जाना मुझे उसके माया जाल मे डाल कर अपने आप को भुला देता है.कोई थोड़ा सा प्यार दिखा देता है तो मैं अपना सब कुछ भूल सा जाता हूँ लोग मुझे अपनी सहूलियत के हिसाब से गले लगाते है फिर उनका गला भारी हो जात...
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